मंज़िले भी उसकी थी,
रास्ते भी उसके ही थे..
लोग भी उसके थे,
काफ़िला भी उसका था..
साथ साथ चलने की सोच भी उसकी थी,
फ़िर रास्ते बदलनें का फैसला भी उसी का था..
आज क्यों अकेला हुँ दिल ये सवाल करता है,
लोग तो उसके ही थें, क्या ख़ुदा भी उसका था...
- राजीव "रजत"
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